चिमाजी आप्पा

Chimaji Appa


चिमाजी आप्पा

आज हम बात करेंगे चिमाजी आप्पा के बारे में. उनका पूरा नाम श्रीमंत चिमाजी बल्लाळ भट ऊर्फ चिमाजी आप्पा ऊर्फ चिमनाजी आप्पा है, उन्हें लोग चिमाजी बल्लाल पेशवा के नाम से जानते है। उनके पिता का नाम बालाजी विश्वनाथ भट था और माँ का नाम राधाबाई। पहले बाजीराव पेशवा उनके बड़े भाई थे। उनकी पत्नियों का नाम था रख्माबाई और अन्नपूर्णा , और सदाशिवराव भाउ उनके पुत्र थे।

Bajirao Peshwa


बाजीराव पेशवा

Personal Life

चिमाजी आप्पा का जन्म १७०७ में हुआ था। उनके बड़े भाई बाजीराव पेशवा ने उन्हें राजनीति और रणनीति से उनका परिचय कराया। चिमाजी आप्पा और बाजीराव पेशवा, इस जोड़ी की दिशा को कभी-कभी ‘राम-लक्ष्मण’ कहा जाता है।

चिमाजी आप्पा ने अपने कार्यकाल में बहुत सी लड़ाईया लड़ी और जीती भी। उनके इस कार्यकाल के बारे में आज हम आपको कुछ बातें बताने वाले है।

१७२० में चिमाजी आप्पा ने पोर्तुगीज के हाथों से कल्याण को मुक्त कराया। १७३० में धीरे धीरे ठाणे और शालशेत द्वीप के किल्ले हासिल किए। इन में पारसिक, त्रांगीपारा, अर्नाला, मनोर, और बेलापुर के किल्ले भी थे।

पोर्तुगीज की सेना उस वक्त गुजरात के पश्चिमी तट पर अपनी विशाल सेना के साथ खड़ी थी और इन सबमे उन्हें वसई के किल्ले का बहुत सहारा था, जिससे उनकी ताकत कई गुना बड़ सकती थी । इसलिए चिमाजी आप्पा ने उनकी उसी ताकत को तोड़ना चाहा, जिससे उनकी सेना कमजोर पड़ सके।

उन्होंने २ साल तक वसई किल्ले के लिए पोर्तुगीज सेना से युद्ध किया और आखिर में पोर्तुगीज को हराकर वसई किल्ले को जित लिया।

Arnala Fort


अर्नाला किल्ला 

वसई किल्ले को पोर्तुगीज से जितने के लिए, उन्होंने पहले अर्नाला किल्ले पर कब्ज़ा करने का सोचा। इसलिए उन्होंने वहाँ के कुछ लोगों को अपने साथ मिला लिया, जिससे उन्हें लड़ाई में उन लोगों की मदत हो सके। गोविंदजी कासार और गवराजी पाटिल इन लोगों को अपने साथ मिला लिया। वह ४०० मराठाओं की सेना को लेकर खुश्की के मार्ग से गए, और समुद्री रस्ते से नाव द्वारा मानाजी आंग्रे ने उन्हें अर्नाला किल्ले तक पोहचाया। और वहाँ जाकर उन्होंने पोर्तुगीज सेना पर हमला कर, हमले से अनजान सेना को हराया।

Vasai Fort


वसई का किल्ला 

फिर २८ मार्च, १७३७ को मराठाओं की सेना ने चिमाजी आप्पा के नेतृत्व में वसई पर हमला किया। किल्ले को चारों ओर से घेर के पोर्तुगीज सेना को किल्ले में ही फ़सा लिया। इसके साथ ही उन्होंने गुरिल्ला चाल भी चालू रखी। पोर्तुगीज सेना ने अपने तकनिकी उपकरणों से मराठों की सेना का बहुत नुकसान किया, पर इससे वह पीछे न हटे और उन्होंने समुद्री रास्ता बंद किया, उनका खाना भी अंदर जाने से बंद किया।सन १७३९ में चिमाजी आप्पा ने किल्ले पर हमला किया। नारो शंकर दानी, मानाजी आंग्रे, और गिरमाजी कानिटकर इन सरदारों ने आखिर में पोर्तुगीज सेना को हार स्वीकार ने पर मजबूर किया। और इस तरह उन्होंने चिमाजी आप्पा के नेतृत्व में वसई का किल्ला हासिल किया।

बाजीराव पेशवा के शासनकाल में चिमाजी आप्पा ने गुजरात के पश्चिमी तट को पोर्तुगीज से मुक्त कराया। १७३९ में उन्होंने पोर्तुगालियों को बाश्टी में भी हराया। इसके अलावा सन १७३६ में चिमाजी आप्पा ने जंजीरा के सिद्धियों को भी पराजित कर दिया। पोर्तुगीज धीरे धीरे अपना व्यापर बढ़ा रहे थे और लोगों को अपना धर्म बदलने के लिए मजबूर कर रहे थे।
उन्होंने उन सब लोगों को पोर्तुगीज के शासन से मुक्त किया और उन्हें फिर से अपने धर्म को अपनाने की छूट दी। जिन्हे वापस अपना धर्म स्वीकारना था, उनके लिए खुद पंडितों को बुलाकर उनका धर्म बदलने में उन्हें साथ दिया। और जिन्हे नहीं बदलना था , उन्हें अपने धर्म में रहने दिया और धर्म की स्वतंत्रता दी । उन्होंने अपने शासनकाल में कई मंदिर बनवाये।
बाजीराव पेशवा की तरह उन्हें भी अच्छे से रणनीति और युद्धांनीति का ज्ञान था। उन्ही की तरह चिमाजी आप्पा ने युद्ध में मराठाओं का वर्चस्व हर जगह निर्माण किया।
चिमाजी आप्पा की 1740 में रावेर खेड़ी नदी के किनारे मृत्यु हो गई थी, उनके भाई बाजीराव पेशवा की भी। वसई के किल्ले में उनकी याद के रूप में उनका स्मारक बनाया गया है। बाद में चिमाजी अप्पा के पुत्र सदाशिव राव भाऊ आगे चलकर पेशवा बालाजी बाजीराव के दीवान नियुक्त हुए ।

Chimaji Appa Smarak


चिमाजी आप्पा स्मारक

Categories: History

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