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26 July 2005 Mumbai Flood


says मिथुन रोडे

कोहली और बुमराह नहीं खेलेंगे वेस्ट इंडीज के खिलाफ , ये है वजह

बीसीसीआइ के एक अधिकारी के मुताबिक विराट कोहली और जसप्रीत बुमराह को तीन मैचों की वनडे सीरीज और इतने ही मैचों की टी 20 सीरीज के लिए आराम दिया जा सकता है। ये दोनों फिर टेस्ट सीरीज के लिए टीम के साथ होंगे। विराट ऑस्ट्रेलिया सीरीज के शुरू होने के बाद से लगातार खेल रहे हैं। अधिकारी के मुताबिक लंबे विश्व कप के बाद कुछ अन्य खिलाड़ियों को बी इस सीरीज के लिए आराम दिया जा सकता है। टीम इंडिया अगर विश्व कप के फाइनल में पहुंचती है तो टीम के मुख्य खिलाड़ी 14 जुलाई तक खेलेंगे। इस लंबे टूर्नामेंट की वजह से टीम के कुछ मुख्य बल्लेबाजों और कुछ तेज गेंदबाजों को आराम देना जरूरी होगा। इस बार टीम इंडिया वेस्टइंडीज दौर पर पहले वनडे और टी 20 सीरीज खेलेगी उसके बाद ही टेस्ट सीरीज खेला जाएगा।

विराट कोहली और जसप्रीत बुमराह को अगर वेस्टइंडीज के खिलाफ वनडे सीरीज के लिए आराम दिया जाता है तो इन दोनों की जगह वनडे टीम में खलील अहमद और मयंक अग्रवाल को जगह मिल सकती है। गौरतलब है कि टीम इंडिया इस वक्त इंग्लैंड में विश्व कप खेल रही है। विराट की कप्तानी में भारतीय टीम का प्रदर्शन विश्व कप में अब तक कमाल का रहा है। भारत ने पांच में से चार मैच जीते हैं और एक मैच बारिश की वजह से बेनतीजा रहा है। टीम इंडिया के पांच मैचों में इस वक्त सात अंक हैं और वो अंक तालिका में तीसरे नंबर पर है। भारत को अब अगला मैच 27 जून को मैनचेस्टर में वेस्टइंडीज के खिलाफ खेलना है।

Kittur ki Rani Chennamma

 

Rani Chennamma

रानी चेन्नम्मा

अब तक अपने झान्सी की राणी लक्ष्मीबाई, राणी ताराबाई, राणी अहिल्याबाई के बारे मे देखा है। इन वीरांगनाओ ने अपने और अपने राज्य के लिये बहुत कुछ किया है। और राज्य को संभाला है। उसी तरह हम आपको आज और एक ऐसेही साहसी वीरांगना के बारे मे बताने वाले है, जिंहोने अन्ग्रेजो से युध किया। तोह ज्यादा देरी न करते हुए अब हम शुरुवात करते है ।

Kittur Fort

कित्तूर किल्ला
Kittur Fort

कित्तूर किल्ला

देश में हर जगह स्वतंत्रता के लिए युध चल रहे थे। कर्नाटका के कित्तूर मै ऐसेही एक युद्ध की शुरुवात 1824 में हुई थी। कर्नाटका के कित्तूर राज्य की रानी चेन्नम्मा इन्होंने ही इस युद्ध की शुरुवात की थी। रानी चेन्नम्मा का जन्म कर्नाटक के ककती गांव में 1778 को हुआ था। उनके पिता का नाम था धुलप्पा देसाई और माँ का नाम पद्मावती था।

Raja Mallasaraja

राजा मल्लसरजा

धुलप्पा देसाई एक बड़े सरदार थे। उन्होंने चेन्नम्मा को अलग अलग युद्ध कौशल में पारंगत किया था। रानी चेन्नमा घोड्सवार, तलवारबाजी और तीर चलाने में माहिर थी। उन्होंने बचपन मे रामायण, महाभारत, वसुपुराण आदि कहानियां सुनी थी। उनके युद्ब कौशल के कारण ही उनकी शादी बेलगाम के राजघराने के राजा मल्लसरजा से हुई। उन्हें अन्याय और क्रूरता पसंद न थी।

उनके न्यायप्रियता के कारण वह लोगों के चहती बन गई। रानी चेन्नम्मा राजा मल्लसरजा की दूसरी पत्नी थी। राजा मल्लसरजा के पहली पत्नी का नाम रुद्रमा था। राजा मल्लसरजा ज्यादा दिन जीवीत न रहे। और उनके बाद उनका बेटा भी न रहा। उस दौरान उन्हें राज्य के राजगद्दी पर एक राजा की जरूरत थी। वैसे तो राज्य का कार्यभार रानी चेन्नम्मा ही संभाल रही थी। पर राजगद्दी पर राजा का होना जरूरी था। उन्होंने बेटा गोद लिया। और उसे राजगद्दी पर बिठाया।

उस समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक कायदा बनाया। जिसके मुताबिक अगर किसी राजा की मृत्यु हो जाय, और उनके बाद उस राजा का कोई बेटा न हो राजगद्दी पर, तो सारा राज्य कार्यभार ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथो में चला जाएगा। और ईसी धोरण अनुसार रानी चेन्नम्मा के गोद लिए बेटे को राजगद्दी पर बिठाने से मना किया। और पूरे राज्य को अंग्रेजों को सोपने को कहा। पर रानी चेन्नम्मा ने इसका विरोध किया। और युद्ध के लिए डट खड़ी हुई।

इस लड़ाई में अंग्रेजों के 20 हजार सिपाही और 400 बंदूकों की सेना के खिलाप उन्होंने युद्ध किया। इस युद्ध मे उनके साथ थे, उनकी सेना के मुख्य सेनापती बलप्पा। उंहोणे ब्रिटिश सेना को पिछे हटने पर मजबुर कर दिया। ब्रिटिश सेना के दो प्रमुख अधिकारि सर वॉल्टर इलियट और मी.स्टीवेंसन को गिरफ्तार कर लिया गया।

उस समय ब्रिटिश सरकार और राणी चेन्नम्मा के बीच एक करार हुआ, जीसके अनुसार इन 2 ब्रिटिश अधिकारियो को छोडं दिया जायेगा। इस कारण राज्य की प्रजा खुश थी। और कुछ समय ऐसा ही रहा। पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी इस बात से बहुत गुस्सा थी। उन्होंने दुसरे युद्ध के लिये बहुत बडी फौज इकट्टा की, और फिर से कित्तुर पर आक्रमण किया।

Bailhongal Fort

बैलहोंगल किल्ला

दूसरा युद्ध रानी चेन्नम्मा का ब्रिटिशों के खिलाप सोलापुर में हुआ था। रानी चेन्नम्मा ने बड़ी बहादुरी से अंग्रेजों का सामना किया। पर इस युद्ध में उन्हें सफलता न मिली। और युद्ध के दौरान ही उन्हें पकड़ लिया गया। उनके गिरफ्तार होने तक 1829 में संगोलि रायन्ना ने गुरिल्ला युद्ध जारी रखा था| रानी चेनम्मा अपने दत्तक लिए हुए बेटे शिवलिंगप्पा को कित्तूर का शासक बनाना चाहती थी लेकिन उन्हे बंदी बनाकर मार दिया गया था| और फिर रानी चेन्नम्मा को पकड़कर बैलहोंगल के किले में कैद करके रखा गया। उसी किले में 21 फरवरी 1829 में उनकी मृत्यु हो गयी थी| ब्रिटिशो के खिलाफ हुए इस युद्ध में रानी चेनम्मा की गुरुसिप्पा ने काफी सहायता की थी|

Sangoli Rayanna

संगोलि रायन्ना

चेनम्मा की महानता आज भी हमें कित्तूर में दिखाई देती है| उनकी याद में 22 से 24 अक्टूबर को हर साल कित्तूर उत्सव मनाया जाता है| उनके सम्मान में नयी दिल्ली के पार्लिमेंट हाउस कॉम्पलेक्स में उनका स्टेचू भी बनवाया गया है| इस स्टेचू को कित्तूर रानी चेनम्मा मेमोरियल कमिटी ने बनवाया था| राणी चेनम्मा का स्टेचू बैंगलोर और कित्तूर में बनवाया गया है| अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में रानी चेनम्मा ने अपूर्व शौर्य का प्रदर्शन किया। पुणे-बेंगलूरु राष्ट्रीय राजमार्ग पर बेलगाम के पास कित्तूर का राजमहल तथा अन्य इमारतें गौरवशाली अतीत की याद दिलाने के लिए मौजूद हैं।

राणी चेन्नम्मा पहिली महिला थी जिंहोने अन्ग्रेजो के खिलाप युद्ध की घोषणा। वह अपने राज्य को बचाने के लिये। पहले राणी चेन्नम्मा ने कर्नाटक और फिर राणी लक्ष्मीबाई और अहिल्याबाई होळकर ने। और राणी येसूबाई ने भी।

Bahirji Naik

बहिर्जी नाइक

Bahitji Naik

बहिर्जी नाइक

क्या आप जानते है छत्रपति शिवाजी महाराज हमेशा अपनी लड़ाई कैसे जीतते थे?
वह अपने स्वराज्य के जासूसों के वजह अपनी हर लड़ाई जीतते थे,इतना ही नहीं बल्कि अपने हर शत्रु की जानकारी उन्हें इनसे ही मिलती थी, जिसके आधार पर वह अपनी योजना बनाते थे।और इन सब जासूसों के प्रमुख थे एक शक़्स, जिनके हर खबर पर शिवाजी महाराज अपने हर युद्ध की व्यूहरचना बनाते थे।

उनका नाम था बहिर्जी नाइक।

आज हम आपको बहिर्जी नाइक के बारे ही बताना चाहते है, जो महाराज की और स्वराज्य के सेना की तीसरी आँख थे।बहिर्जी नाइक किल्ले के आसपास के जंगलों में रहनेवाले थे। वह पहले अपनी पेट की भूख के लिए बहुरूपी भेस बदलकर लोगों का मनोरंजन करते थे। वह भेस बदलने में माहिर थे, और नक़ल करने में भी। वह तो बातों में भी बहुत होशियार थे।

Chhatrapati Shivaji Maharaj

छत्रपति शिवाजी महाराज

बहिर्जी की पहली मुलाखत महाराज से हुई, तब महाराज स्वराज्य की सेर पर निकले थे। बहिर्जी अपनी कला दिखा रहे थे, उस वक्त उनका यह कौशल महाराज को पसंद आया और महाराज ने इसका फायदा स्वराज्य के लिए करना चाहा। बहिर्जी नाइक को महाराज ने अपने गुप्तहेर खाते में शामिल किया, जो शत्रुओं की जानकारी महाराज को देता था। इसी गुप्तहेर खाते का प्रमुख महाराज ने बहिर्जी नाइक को बनाया।

महाराज के इस गुप्त विभाग में लगभग चार से छह हजार सैनिक थे। जो महाराज की सेना के खास थे, क्यूंकि उनसे मिली हर जानकारी के बिना उनकी हर लड़ाई नाकाम हो सकती थी। इन जासूसों के जानकारी के आधार पर ही महाराज अपनी लड़ाई की चाल तय करते थे। इन सारे ६ हजार लोगों का नेतृत्व ६ लोग करते थे। और इन ६ लोगों के प्रमुख थे बहिर्जी नाइक। यह सारे लोग विजापुर, दिल्ली, कर्नाटक, पुणे, सूरत इन जगह पर फैले हुए थे। बहिर्जी ने गलत जानकारी देने पर किल्ले से कडेलोट की शिक्षा तय की थी। क्योकि इन जानकारिओं के आधार पर ही महाराज युद्ध की तैयारी करते।

बहिर्जी के गुप्तहेर खाते की कोई भाषा न थी। वह पंछियो और हवा के आवाज से अपने लोगों तक जानकारी पहुचाते थे, ताकि जानकारी का पता शत्रु को न लगे। महाराज किस मोहिम पर जा रहे है इस बात का पता सबसे पहले बहिर्जी को होता, और फिर वह और उनके लोग वहाँ के ईलाके की, और शत्रु की हर एक बात और चाल का पता लगाते थे। और वह खबर महाराज तक जल्द से जल्द पहुँचाते थे।

Bharji Naik

बहिर्जी नाइक

बहिर्जी नाइक किसीभी फकीर, वासुदेव, कोली, संत आदि भेस बदलने में माहिर थे। बहिर्जी सिर्फ भेस बदलने में ही नहीं बल्कि किसी के भी मुंह से हर एक बात चुराने में भी माहिर थे। वह आदिलशाह और औरंगजेब बादशाह के मुंह से भी बात चुराते थे , वो भी उनके महल में जाकर। और अगर आदिलशाह और बादशाह को पता चल भी गया की वह एक जासूस है तब भी वह बहिर्जी को पकड़ न पाते थे।

बहिर्जी ना केवल एक जासूस थे, बल्कि एक सैनिक भी थे। वह तलवार बाजी और दान पट्टा चलाने में भी माहिर थे। क्युकी कब किस घटना का सामना करना पड़े यह उनका विचार था। वह हर घटना के बारे में बहुत ध्यान से सोचते थे। शत्रु का जासूस कौन है? वह जासूस क्या करते है? वह इसके बारे में भी जानकारी रखते थे। बहिर्जी दुशमन तक गलत अफ़वाए कैसे पहुंचानी है यह भी अच्छे से जानते थे, और यह काम बहिर्जी और उनके गुप्त हेर खाते के लोग बड़ी सफाई से करते थे। बहिर्जी नाइक केवल शत्रु की ही नहीं बल्कि स्वराज्य की भी हर एक जानकारी के बारे में महाराज तक खबर पहूँचाते थे।

महाराज के अष्टप्रधान मंडल में गुप्तहेर खाते के प्रमुख बहिर्जी नाइक थे। वह हर जगह हर वक्त अलग अलग भेस में जाते थे। इसलिए वह जब भी कभी महाराज से मिलने जाते तब वह किसी अलग रूप में ही होते। और उन्हें सिर्फ महाराज ही पहचान पाते थे। महाराज के दरबारियों को भी पता नहीं था बहिर्जी नाइक के बारे में। दरबारी तो सिर्फ बहिर्जी जी के नाम से ही चर्चित थे।

इतिहास में भी किसीभी पुस्तक में उनके रूप के बारे में कुछ भी लिखित नहीं है। उनका सिर्फ नाम ही जानते है लोग। उनके मृत्यु के बारे में आज तक कोई खबर नहीं मिली है। ऐसा कई लोगों का मानना है की, ” भुपालगढ़ पर जासूसी करते समय उनकी मृत्यु हो गई।”, और कइयों का यह भी कहना है की ” लड़ाई में जख्मी होने पर भुपालगढ़ आने के बाद महादेव मंदिर में महादेव के चरणों में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। “

जिन इतिहासकरों ने गुप्तहेर जासूस के बारे में पता किया, उनके लिए उन्होंने एक सूत्र बनाया है की, जासूस मतलब ‘गुमनांम रहना’। जब तक एक जासूस गुमनाम रहता है, तब तक वह सफल होता है। और बहिर्जी आखिर तक गुमनाम रहे। इसी कारन उनके मृत्यु का भी किसी को ज्यादा पता नहीं है। यानि की उनकी मृत्यु का उत्तर इतिहास कारों के पास भी नहीं है।

Banurgadh

बानुरगड़

बानुरगड़ , महाराष्ट्र के सांगली जिले के खानपुर तालुका में एक किल्ला है। यह किल्ला महाराष्ट्र के सांगली जिले के पूरब की तरफ है। यही सोलापुर जिले की शुरुवात है। वह उस किल्ले में ही बहिर्जी नाइक की समाधी स्थित है। बहिर्जी नाइक जैसा जासूस न कभी हुआ है और न कभी होगा। बहिर्जी नाईक पर ‘Bajind’ नाम की किताब भी है।

Bajiand Book

बाजींद

Dhurala Marathi Movie – Upcoming Marathi Movie

This year Zee Studio is coming with new marathi movie Dhurala .

This movie has huge Marathi starcast.

Ankush Chaudhari

Ankush Choudhari
Ankush Choudhari

Sai Tamhankar

Sai Tamhankar
Sai Tamhankar

Sonalee Kulkarni

Sonalee Kulkarni
Sonalee Kulkarni

Siddharth Jadhav

Siddharth Jadhav
Siddharth Jadhav

Abhinav Berde

Abhinav Berde
Abhinav Berde

Abhijeet Chavan

Abhijeet Chavan
Abhijeet Chavan

Kushal Badrike

Kushal Badrike
Kushal Badrike

and many more starcast.

Shiva Kashid

शिवा काशिद

Shiva Kashid
शिवा काशिद

शिवा काशिद पन्हाला किल्ले के नजदीक नेबापुर गांव से थे । उनका जनम एक नाई परिवार में हुआ। वह स्वराज्य के मावले थे | जो स्वराज्य और छ. शिवाजी महाराज के लिए अपनी जान भी देने के लिए तैयार थे। ऐसा कहा जाता है कि वह दिखने में छ. शिवाजी महाराज जैसे थे।

ज्यादा देरी ना करते हुए हम बात करते है इस एक दिन के छ. शिवाजी महाराज की |

Chhatrapati Shivaji Maharaj
छ. शिवाजी महाराज
Panhala Fort

पन्हाला गड

 

दरअसल हुआ यूं के 1659 मैं छ. शिवाजी महाराज ने अफजल खान को मारने के बाद विजापुर के दरबार से अफ़ज़ल खान की मृत्यु का बदला लेने के लिए सिद्धी जौहर को भेजा गया। सिद्धी जौहर अपनी विशाल सेना लेके स्वराज्य में आ गया। उस वक्त महाराज पन्हाला गड पे थे। सिद्धी जौहर ने पन्हाला किले को चारों और से घेर लिया। छ. शिवाजी महाराज ने सोचा कि अब बारिश का मौसम आएगा तब सिद्धी ज़ोहर घेराबंदी निकाल देगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सिद्धी ने घेराबंदी निकाली नही।

Siddi Johar

सिद्धी जौहर

छ. शिवाजी महाराज को वहा से निकलना था। इसलिए उन्होंने एक चाल खेली। वह सिद्धी जौहर को करार के लिये संदेसे भेजने लगे। करार करने का दिन तय हुआ। जिस दिन करार करना था उसके एक दिन पहले ही रात को महाराज ने वहां से निकलने की योजना की। उस दिन जोरदार बारिश हो रही थी। शिवाजी महाराज चंद मावलों के साथ वहां से निकले। उन मावलों में उनके साथ बाजी प्रभु देशपांडे और सिधोजी नाइक निम्बालकर थे। एक ओर जंगल के रास्ते से छ. शिवाजी महाराज किले से नीचे आ रहे थे। और दूसरी तरफ से शिवा काशिद शिवाजी महाराज के रूप में पालखी में बैठ कर कुछ मावलों के साथ किले से नीचे उतर रहे थे।

Baji Prabhu Deshapande
बाजी प्रभु देशपांडे

शिवा काशिद को महाराज के रूप में इसलिए भेजा गया के मुगल सेना को असली शिवाजी महाराज तक पोहचने में वक्त लगे और शिवाजी महाराज को भी गढ़ से नीचे जाने में आसानी हो सके । सिद्धी मसूद ने शिवा काशिद को पकड़ा। मसूद बोहत खुश हो गया । उसे लगा उसने शिवाजी महाराज को पकड़ा है। मसूद शिवा काशिद को लेकर सिद्दी ज़ोहर के शामियाने में पोहचा । सिद्दी ज़ोहर शिवा काशिद को देखकर बोला ” वाह रे सिवा, करार की बात करे बिना ही गढ़ से भागना चाहता था तू । यह सिद्दी ज़ोहर है मेरे हाथ से कोई नही बचता ” यह बोलकर वह जोरोसे हँसने लगा। महाराज के रूप में होने वाले शिवा काशिद ने करार की बात छेड़ि। अब शिवा काशिद और ज़ोहर करार की बाते करने लगे।

इतने में उनका एक सिपाई शामियाने में भागते हुए आया ओर उसने कहा “हुजूर हुजूर सिवाजी भाग गया” ।
ज़ोहर उस सिपाही पे गुस्सा हो गया और कहा अगर सिवाजी भाग गया तोह यह कोन है” । यह कह कर उसने फाजल खान को देखने को कहा। यह सुनकर सिद्दी जोहर ने शिवा काशिद को देखने के लिए फाज़ल खान को बुलाया।

फाजल खान यह अफ़ज़ल खान का लड़का था। फाजल खान नजदीक आया और उसमें शिवा काशिद के सर का जिरेटोप ऊपर किया और वह बोला “हुजूर यह सिवाजी नही है। सिवा ने हमारे अब्बाजान का कतल किया उस समय सिवा के सर पर घाव हुआ था। उसकी निशानी इसके सर पर नही है।” ज़ोहर गुस्सा हुआ उसने शिवा काशिद को बोहत बार पूछा कि “अगर तुम सिवा नहीं हो तोह कोंन हो तुम?”

शिवा काशिद भी उसपे एक ही जवाब कहता रहा कि “में ही हु सिवा”।

सिद्धी ज़ोहर बोहत ही गुस्सा हुआ और उसने काशिद को मार डालने का हुकुम दिया। तब शिवा काशिद ने ज़ोहर से कहा कि “भलेही मैं इस दुनिया में शिवा काशिद बनके पैदा हुआ हूं लेकिन मरते वक्त छ. शिवाजी महाराज बनके इस दुनिया से जा रहा हूँ। मेरे लिए इससे खुशी की बात क्या होगी कि मेरे जिस्म पे छ. शिवाजी महाराज के वस्त्र और माँ भवानी की कवड़ो की माल है।” इस तरह उनको वीरगति प्राप्त हुई।
उन्हें पता था कि अब वह जिंदा नही रहने वाले लेकिन उसके बावजूद भी उनके चेहरे पर किसी भी प्रकार का डर नही था। ऐसे थे छ. शिवाजी महाराज के शुरवीर मावले शिवा काशिद।

जब पन्हाला के घेराबंदी की बात की जाती है तब हम अक्सर वीर बाजी प्रभु देशपांडे का नाम लिया जाता हैं लेकिन शिवा काशिद को भूल जाते है। वीर शिवा काशिद को भी हमे उसी प्रकार याद करना होगा जिस प्रकार हम शुर बाजीप्रभु देशपांडे को याद करते है।

शिवा काशिद को मालूम था के वह मौत के मुँह में जा रहे है लेकिन उन्हें उसका कोई ख़ौफ़ नही था बल्कि उन्हें खुशी थी कि वह छ शिवाजी महाराज और स्वराज्य के काम आ रहे है।

और उन्हेंने कहा भी है कि “हमारे राजा के लिए में हजार बार मरने को तैयार हूं”

Shiva Kashid Statue

शिवा काशिद का स्मारक

इस घटना के बाद शिवा काशिद का स्मारक पन्हाला किले पर बनाया गया और वह आज भी आप वहां देख सकते हो।

Fatteshikast Marathi Movie – Upcoming Marathi Movie

Fatteshikast Marathi Movie

After the huge success of “Farzand” movie, Director Digpal Lanjekar is coming with India’s first surgical strike “Fatteshikast”.

Fatteshikast movie
Fatteshikast

Chinmay Mandlekar comes out with “Shivaji Maharaj

Chinmay Mandlekar as Chh. Shivaji Maharaj ( Fateshikast )
Chinmay Mandlekar as Chh. Shivaji Maharaj

Ankit Mohan (Kondaji Farzand in “Farzand” movie) will play the role of  “Sarsenapti Yesaji Kank”.

Ankit Mohan as Yesaji Kank (Fateshikast)
Ankit Mohan as Sarsenapati Yesaji Kank

With these two, Mrunal Kulkarni, Mrunmayee Deshpande, Anup Soni, Nikhit Raut and etc. are playing important roles in Movie. The filming started on Maharashtra Day (1st May)

Chimaji Appa

चिमाजी आप्पा

Chimaji Appa

चिमाजी आप्पा

आज हम बात करेंगे चिमाजी आप्पा के बारे में. उनका पूरा नाम श्रीमंत चिमाजी बल्लाळ भट ऊर्फ चिमाजी आप्पा ऊर्फ चिमनाजी आप्पा है, उन्हें लोग चिमाजी बल्लाल पेशवा के नाम से जानते है। उनके पिता का नाम बालाजी विश्वनाथ भट था और माँ का नाम राधाबाई। पहले बाजीराव पेशवा उनके बड़े भाई थे। उनकी पत्नियों का नाम था रख्माबाई और अन्नपूर्णा , और सदाशिवराव भाउ उनके पुत्र थे।

Bajirao Peshwa

बाजीराव पेशवा

Personal Life

चिमाजी आप्पा का जन्म १७०७ में हुआ था। उनके बड़े भाई बाजीराव पेशवा ने उन्हें राजनीति और रणनीति से उनका परिचय कराया। चिमाजी आप्पा और बाजीराव पेशवा, इस जोड़ी की दिशा को कभी-कभी ‘राम-लक्ष्मण’ कहा जाता है।

चिमाजी आप्पा ने अपने कार्यकाल में बहुत सी लड़ाईया लड़ी और जीती भी। उनके इस कार्यकाल के बारे में आज हम आपको कुछ बातें बताने वाले है।

१७२० में चिमाजी आप्पा ने पोर्तुगीज के हाथों से कल्याण को मुक्त कराया। १७३० में धीरे धीरे ठाणे और शालशेत द्वीप के किल्ले हासिल किए। इन में पारसिक, त्रांगीपारा, अर्नाला, मनोर, और बेलापुर के किल्ले भी थे।

पोर्तुगीज की सेना उस वक्त गुजरात के पश्चिमी तट पर अपनी विशाल सेना के साथ खड़ी थी और इन सबमे उन्हें वसई के किल्ले का बहुत सहारा था, जिससे उनकी ताकत कई गुना बड़ सकती थी । इसलिए चिमाजी आप्पा ने उनकी उसी ताकत को तोड़ना चाहा, जिससे उनकी सेना कमजोर पड़ सके।

उन्होंने २ साल तक वसई किल्ले के लिए पोर्तुगीज सेना से युद्ध किया और आखिर में पोर्तुगीज को हराकर वसई किल्ले को जित लिया।

Arnala Fort

अर्नाला किल्ला 

वसई किल्ले को पोर्तुगीज से जितने के लिए, उन्होंने पहले अर्नाला किल्ले पर कब्ज़ा करने का सोचा। इसलिए उन्होंने वहाँ के कुछ लोगों को अपने साथ मिला लिया, जिससे उन्हें लड़ाई में उन लोगों की मदत हो सके। गोविंदजी कासार और गवराजी पाटिल इन लोगों को अपने साथ मिला लिया। वह ४०० मराठाओं की सेना को लेकर खुश्की के मार्ग से गए, और समुद्री रस्ते से नाव द्वारा मानाजी आंग्रे ने उन्हें अर्नाला किल्ले तक पोहचाया। और वहाँ जाकर उन्होंने पोर्तुगीज सेना पर हमला कर, हमले से अनजान सेना को हराया।

Vasai Fort

वसई का किल्ला 

फिर २८ मार्च, १७३७ को मराठाओं की सेना ने चिमाजी आप्पा के नेतृत्व में वसई पर हमला किया। किल्ले को चारों ओर से घेर के पोर्तुगीज सेना को किल्ले में ही फ़सा लिया। इसके साथ ही उन्होंने गुरिल्ला चाल भी चालू रखी। पोर्तुगीज सेना ने अपने तकनिकी उपकरणों से मराठों की सेना का बहुत नुकसान किया, पर इससे वह पीछे न हटे और उन्होंने समुद्री रास्ता बंद किया, उनका खाना भी अंदर जाने से बंद किया।सन १७३९ में चिमाजी आप्पा ने किल्ले पर हमला किया। नारो शंकर दानी, मानाजी आंग्रे, और गिरमाजी कानिटकर इन सरदारों ने आखिर में पोर्तुगीज सेना को हार स्वीकार ने पर मजबूर किया। और इस तरह उन्होंने चिमाजी आप्पा के नेतृत्व में वसई का किल्ला हासिल किया।

बाजीराव पेशवा के शासनकाल में चिमाजी आप्पा ने गुजरात के पश्चिमी तट को पोर्तुगीज से मुक्त कराया। १७३९ में उन्होंने पोर्तुगालियों को बाश्टी में भी हराया। इसके अलावा सन १७३६ में चिमाजी आप्पा ने जंजीरा के सिद्धियों को भी पराजित कर दिया। पोर्तुगीज धीरे धीरे अपना व्यापर बढ़ा रहे थे और लोगों को अपना धर्म बदलने के लिए मजबूर कर रहे थे।
उन्होंने उन सब लोगों को पोर्तुगीज के शासन से मुक्त किया और उन्हें फिर से अपने धर्म को अपनाने की छूट दी। जिन्हे वापस अपना धर्म स्वीकारना था, उनके लिए खुद पंडितों को बुलाकर उनका धर्म बदलने में उन्हें साथ दिया। और जिन्हे नहीं बदलना था , उन्हें अपने धर्म में रहने दिया और धर्म की स्वतंत्रता दी । उन्होंने अपने शासनकाल में कई मंदिर बनवाये।
बाजीराव पेशवा की तरह उन्हें भी अच्छे से रणनीति और युद्धांनीति का ज्ञान था। उन्ही की तरह चिमाजी आप्पा ने युद्ध में मराठाओं का वर्चस्व हर जगह निर्माण किया।
चिमाजी आप्पा की 1740 में रावेर खेड़ी नदी के किनारे मृत्यु हो गई थी, उनके भाई बाजीराव पेशवा की भी। वसई के किल्ले में उनकी याद के रूप में उनका स्मारक बनाया गया है। बाद में चिमाजी अप्पा के पुत्र सदाशिव राव भाऊ आगे चलकर पेशवा बालाजी बाजीराव के दीवान नियुक्त हुए ।

Chimaji Appa Smarak

चिमाजी आप्पा स्मारक

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